फिक्रमंद खुद के रहो यारो।
ये दुनिया किसी की न हुई।।
खुद से खुद का इश्क़ न हुआ गर।
तो समझो ज़िन्दगी ये बेकार गयी।।
गर मिटा भी दो खुद को कभी।
किसी को परवाह नही।।
अपनी भी कद्र कभी।
जमाने को हुई नही।।
उम्र तमाम गुजरी इस कदर।
न रूबरू हो पाए खुद से कभी।।
इल्म हुआ जब इस बात का।
उम्र तभी तमाम हुई।।
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