ख्वाइशों के परिंदे उड़ा करते थे कभी
बेपरवाही को देख जला करते थे सभी
आज भी नादाँ परिंदे उड़ने को बेचैन हैं
ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद ने उन्हें बेपंख जो कर दिया
क्या खूब ज़िन्दगी थी
आसमान को पाने की ख्वाइश थी
आसमान तो आज भी वहीँ है
पर हमने उसे देखना छोड़ दिया
ख्वाइश और ज़रुरत की ज़ंग में
ख्वाइशों ने दम तोड़ दिया
ज़रूरतों को पूरा करते करते
खुद को ही मिटा बैठे हम
शुक्र अदा करता हूँ मैं उसका
रहने को जो उसने खूबसूरत जहाँ दिया
देने की क्या बात करूँ उसकी
जो दिया उसने बहुत दिया
Very nice lines
ReplyDeleteVery nice lined
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