Sunday, October 4, 2020

खुद को ही भुला बैठा मैं

तुम को देखा तो खुद को ही भुला बैठा मैं
दो पल का वो सफर ज़िन्दगी का सफर बना बैठा मैं
चाहते और ख्वाहिशें तो ना थी कुछ भी तकदीर से
पर न जाने तुझे पाकर तकदीर अपनी बना बैठा मैं

कुछ कसमें और वादे भी किये थे हमने
सुख और दुःख में साथ निभाने के
पर जब बात आई मुश्किलो में साथ चलने की
तो हर बार पाया अपने से आगे तुझको

जानता हूँ ज़िंदगी में एक ऐसा वक़्त भी आएगा
कोई न आएगा जब साथ निभाने को
आँख मूँद कर चलना बेपरवाही से
जो में होऊंगा हर पल तेरा साथ निभाने को 

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