Sunday, October 4, 2020

ख्वाइशों के परिंदे

ख्वाइशों के परिंदे उड़ा करते थे कभी
बेपरवाही को देख जला करते थे सभी
आज भी नादाँ परिंदे उड़ने को बेचैन हैं
ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद ने उन्हें बेपंख जो कर दिया 


क्या खूब ज़िन्दगी थी
आसमान को पाने की ख्वाइश थी
आसमान तो आज भी वहीँ है
पर हमने उसे देखना छोड़ दिया

 

ख्वाइश और ज़रुरत की ज़ंग में
ख्वाइशों ने दम तोड़ दिया
ज़रूरतों को पूरा करते करते
खुद को ही मिटा बैठे हम 


शुक्र अदा करता हूँ मैं उसका
रहने को जो उसने खूबसूरत जहाँ दिया
देने की क्या बात करूँ उसकी
जो दिया उसने बहुत दिया

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