क्यों करूँ मैं परवाह !
हर किसी की ज़माने में !!
खुश तो मैं इसी में हूँ की !
बेपरवाही मुझमे भी बहुत हैं !!
मुझे न फुरसत की निकालूं कमियां !
हर किसी की ज़माने में !!
मस्त तो मैं इसी में हूँ की !
कमियां मुझमे भी बहुत हैं !!
वैसे तो पड़ा है ज़माना भी !
कमियां मेरी निकालने में !!
मज़ेमें तो मैं इसी में हूँ की !
ज़माना भी है बेक़रार कामिल मुझे बनाने में !!
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